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मीडिया साक्षरता अभियान – क्या और क्यों?

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बच्चों को अक्सर सूचना और जानकारी के स्रोतों का सम्मान करने को कहा जाता है। किताबों के पन्नो पर लिखना गलत माना जाता है, और अखबार पढ़ना या टीवी पर न्यूज़ देखना अच्छी आदतें मानी जाती हैं। “ऐसा न्यूज़ में बता रहे थे” – ये लाइन आपने सुनी ही होगी, जैसे कि न्यूज़ का असली स्रोत क्या है, उससे मतलब ही न हो। न्यूज़ है, इतना काफी है। सही ही होगा। और ऊपर से, दूसरो को नयी जानकारी देने में खुद का ओहदा भी बढ़ता है। फिर क्या सच और क्या झूठ।

इसलिए यह बहुत अचरज की बात नहीं, कि बड़े होते हुए हम मीडिया के प्रति एक अजीब श्रद्धा की भावना रखने लगते हैं। हम उसपर निर्भर करने लगते हैं और उसपे सवाल करना भूल जाते हैं।

गड़बड़ तो तब होती है जब यह श्रद्धा रोमांच में बदलने लगती है। हाई-प्रोफाइल पत्रकार और न्यूज़ एंकर जब टीवी पर बोलते नज़र आते हैं, और जब आप पत्रकारों को बाढ़ के समय डेढ़ फुट पानी में बोलते देखते हैं, तब आप सम्मोहित हुए मुंह बाए देखते हैं, और भूल जाते हैं कि मीडिया पर संदेह भी करना चाहिए। मीडिया फिर सिनेमा की भांति एक अलग ही आकर्षक दुनिया लगने लगती है।

पर मीडिया जब ऐसी लगने लगे, तब उसकी आलोचना कौन करेगा? सरकार और मंत्रियो की बुराई तो सभी करते मिलते हैं, पर क्या मीडिया उस आलोचना से ऊपर है? क्या हम सभी को मीडिया की भली-भांति समझ है?

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लोकतंत्र अपनी संस्थाओं की वजह से जीवित है। सबसे ऊंची तीन संस्थाएं हैं: सरकार, हमारे सांसद, और हमारी न्याय व्यवस्था। ये तीनो एक दूसरे पर नज़र रखते हैं, जिससे कोई कभी इतना शक्तिशाली या अक्षम न हो जाए कि लोकतंत्र ही चरमरा जाए।

फिर आता है “चौथा स्तंभ”, अर्थात मीडिया, जिसका काम है इन तीनो की निगरानी करना। सोचिये अगर मीडिया ही किसी ऐसी शक्ति के वश में आ जाये जिसे हमारी भलाई से कोई मतलब नहीं, तो लोकतंत्र का क्या होगा?

मीडिया साक्षरता अभियान का उद्देश्य

हम मीडिया से इतने प्रलोभित हो चुके हैं, कि फेक न्यूज़ और प्रोपेगंडा हमें अलग करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।

हम मीडिया से इतने प्रलोभित हो चुके हैं, कि फेक न्यूज़ और प्रोपेगंडा हमें अलग करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।

मीडिया पर गुस्सा करते भी हैं तो ऐसे गलत सवाल पूछ कर: “मीडिया हर समय सरकार की इतनी शिकायत क्यों करता है?” और “मीडिया हमेशा बुरी चीज़ें क्यों दिखाता है?” (फिलहाल उत्तर यह है कि मीडिया का काम ही यही है। जिस दिन मीडिया अच्छी चीज़ें कुछ ज़्यादा ही दिखाने लगे, उस दिन कुछ गड़बड़ है।) फिर कभी यह बोलते हैं कि मीडिया पर इतनी सनसनीखेज़ बातें और शोर कोहराम क्यों है भाई? (इसका उत्तर यह है, कि आप देखते हैं, इसलिए आपको ऐसा दिखाया जाता है।)

यह सुनिश्चित करने के लिए कि लोकतंत्र का यह चौथा स्तंभ सही काम करे और जनता से डरे, हमें भारत में बड़े पैमाने पर एक “मीडिया साक्षरता अभियान” की ज़रूरत है।

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मीडिया श्रद्धा और रोमांच के लिए नहीं है। यह हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था का एक बेहद ज़रूरी अंग है जिसपर बहुत ज़िम्मेदारी है। हम दुनिया में जो कुछ भी जानते हैं, जैसी भी सोच रखते हैं, किसे पसंद करते हैं और किसे नापसंद, गंभीर मुद्दों पर हमारी राय क्या है, यह सब मीडिया के हाथ में है।

जब मीडिया हमारे अंदर के भय का फायदा उठाने लगे, सरकार की बेहद प्रशंसा करने लगे, आलसी हो जाए, या क्या दिखाना है और क्या नहीं, यह सोचने में पक्ष लेने लगे, तब उसके प्रति क्रोध की ज़रूरत है।

सरकार, जजों और सांसदों से कहीं ज़्यादा समय हम न्यूज़ और सूचना के साथ व्यतीत करते हैं। फिर भी इसके बारे में हमारा ज्ञान, क्रोध, और हमारी इच्छाएं न के बराबर हैं।

हमें मीडिया के बारे में बात करनी चाहिए। हमें इसके प्रति लड़ना होगा और एक ऐसे अभियान की ज़रूरत है जो मीडिया के उपभोग पर जनता को प्रशिक्षित करे।

कुछ विषय जिनपर मीडिया साक्षरता अभियान में बात ज़रूरी है: फेक न्यूज़, प्रोपेगंडा, इंसान के भय और मनोविज्ञान, विज्ञापन, मीडिया का राजनीति पर प्रभाव, सिनेमा, जाति और स्त्री-पुरुष के समीकरण, इत्यादि।

भारत में इस आंदोलन को बनाने में मदद करने के लिए कृपया मुझे ईमेल करें: tanay.s91@gmail.com

 

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