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हिंदी दिवस पर कुछ फेसबुकिया वाद-विवाद

Today is Hindi Diwas. It all started when Anurag Kundu, a friend and colleague, posted this on Facebook, quoting Gandhi: “It has always been my conviction that Indian parents who train their children to think and talk in English from their infancy betray their children and their country. They deprive them of the spiritual and social heritage of the nation, and render them to that extent unfit for the service of the country.” There was a debate, following which Rajender Singh posted on his blog a rebuttal to all the comments protesting what Gandhi said. His post is written in Hindi and may be read here.

The current post by me is a response to Rajender’s post.

इस पोस्ट के लिए धन्यवाद | मैं निम्नलिखित बिन्दुओं पर ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा:

1. कथित पंक्ति गांधीजी ने अपनी आत्मकथा में लिखी थी (तेइसवें अध्याय में) | यदि सन्दर्भ जानने के इच्छुक हों तो यह लिंक देखें | जहाँ तक मेरी समझ है, शिक्षा पद्धति और बच्चो के पालन-पोषण के सन्दर्भ काफी भिन्न हैं | बच्चो को स्कूलों में द्विभाषी शिक्षा दी जाए या नहीं (अंग्रेजी और मातृभाषा दोनों का प्रयोग), इसका विवाद बच्चो को घर पर अंग्रेजी सिखाने के विवाद से बिलकुल अलग है | मेरा मानना है कि उन बच्चो के लिए जिनकी मातृभाषा अंग्रेजी नहीं है, स्कूली शिक्षा द्विभाषी बनाने से सीखना सरल हो जाता है और इससे बच्चो का बेहतर विकास होता है | वहीं दूसरी तरफ यदि घर पर बच्चे को एक अंग्रेजी परिवेश में बढ़ने का मौका मिले, तो इसके परिणाम अलग होते हैं | परिणाम इस बात पर निर्भर करता है कि माता-पिता का उद्देश्य क्या है – क्या वे बच्चे को झूठी शान में अपनी संस्कृति की सूली चढ़ाकर अंग्रेजी में निपुण बनाना चाहते हैं, या वे उसे एक काबिल बहुभाषी इंसान बनाना चाहते हैं (जो कुशल अंग्रेजी की सहायता से आज के वैश्विक समाज में अव्वल हो सके, पर अपनी भाषाओं का भी उतना ही ज्ञान हो) | क्या वे बच्चे को यह सन्देश दे रहे हैं कि अंग्रेजी जानना विशेष उपलब्धि है और हमें उच्चतर दर्जे का इंसान बनाता है, या यह सन्देश दे रहे हैं कि हमें हर भाषा में निपुणता पानी चाहिए ? यदि उनका उद्देश्य पहला है, तो यह हमारी सभ्यता और राष्ट्रीय गौरव के लिए घातक और एक दुर्भाग्यपूर्ण प्रचलन होगा | पर यदि उद्देश्य दूसरा है, तो इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है! मुझे नहीं मालूम कि गांधी जी ने किस प्रकार के अभिभावक की बात की थी |

क्या नयी संस्कृति अपनाना गुनाह है? हाँ, पर तभी जब नयी संस्कृति अपनी संस्कृति के गौरव की कीमत पर लायी जाए | यदि दो संस्कृतियों का इस कदर मिश्रण हो कि दोनों की अच्छी बातें अनुसृत की जाएँ, तो दिक्कत क्या है?

2. आपके कहे अनुसार मैंने स्वयं से पूछा कि मैंने कितना हिंदी साहित्य पढ़ा है | उत्तर मिला शायद ही कुछ | पर जैसा कि आपने कहा, इससे यह कतई नहीं पता लगता कि मैं इस देश के लिए कितना बहुमूल्य हूँ |

3. भारत विभिन्नता भरा देश है, यदि अंग्रेजी ही सबको जोड़ने वाली वह भाषा हो, तो इससे क्या परेशानी है | अंग्रेजी ब्रिटिश राज की धरोहर ज़रूर है, पर आज के वैश्विक परिवेश में यह उससे बढ़ कर काफी कुछ है | यह दुनिया को जोड़ने का काम करता है | आज अंग्रेजी वह अतुल्य भाषा है जो इंसानो को जोड़ने की क्षमता रखती है | यदि नाना प्रकार की संस्कृतियों के लोग साथ में रहे पर कोई किसी से बात ही न कर पाये, तो उनकी भाषाओं का क्या सन्दर्भ? क्या पुराने ज़माने में वे इंसान की हैसियत से  एक दूसरे से बात कर पाते? अंग्रेजी को एक विदेशी भाषा की तरह देखने का समय अब नहीं रहा, अब इसे इंसानियत की भाषा की तरह देखा जाना चाहिए और इसको सबका भरपूर साथ चाहिए | इसमें हिंदी के लिए कोई दुःख की बात नहीं है, हिंदी अपनी जगह है | बस ये है की इंसानियत को प्रकृति की शुरुआत से ऐसी एक वैश्विक भाषा की ज़रूरत थी | यदि अंग्रेजी वह भाषा बन गयी, तो ठीक ही तो है, चलिए इसी को आगे बढ़ाते हैं | अगर अभी लड़ पड़े कि मुझे अपनी मातृभाषा को वैश्विक भाषा बनाना है, और मुझे अपनी मातृभाषा को, तो हमें वह सपनो वाली “इंसानियत की भाषा” कभी नहीं मिल पायेगी | आइये, अंग्रेजी का इसी बात पर आलिंगन करें और इसको फ़ैलाने में योगदान करें !

4. फिर से वही बात आ जाती है कि हम इन सब में अपनी मातृभाषा न भूलते जाएँ | और दरअसल यह होगा | समाज की गति को कौन रोक पाया है ! हम कोशिश करेंगे कि हमारी संस्कृति और भाषा जीवित रहे, पर एक दिन अंग्रेजी के चक्कर में चीज़ें नष्ट होंगी | इसलिए नहीं कि इसे होना ही था, पर इसलिए कि कुछ लोगो के लिए अंग्रेजी झूठी शान का प्रतीक बन जायेगा और वह लोग अपनी संस्कृति को ही नीच नज़र से देखना शुरू करेंगे | यदि ऐसा न हो और सबको सुबुद्धि हो, तो दोनों भाषाएँ आपस में ताल मेल से रह सकती हैं |

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5. हाँ, अपनी संस्कृति और भाषा से वंचित रह जाने से इंसान अपने परिवेश की कुछ बारीकियों से वंचित रह जाता है | पर यदि वह सचमुच अपने देश की सेवा करना चाहे, तो वह तब भी कर सकता है | आध्यात्मिक और सामाजिक विरासत हमारा बहुमूल्य अंग हैं और इनको जानना अत्यावश्यक है, पर इसका मतलब यह नहीं कि ज़िन्दगी के बस यही दो अंग हैं | क्या यह एक आध्यात्मिक विचार नहीं कि हम अपनी भाषा और समाज से उठ कर संपूर्ण जगत की ही सेवा कर जाएँ ! क्यों हम बस अपने देश की ही सेवा की बात करें? क्यों हम राष्ट्रीय सेवा और देशप्रेम के नाम पर इंसानियत को बड़े पैमाने पर देखने से कतरा रहे हैं? और यदि कोई अभिभावक अपने बच्चे की ऐसी अंग्रेजी परवरिश करे कि उसका दिमाग अपनी संस्कृति से दूर की सोचे, तो हम उसको गद्दार की उपाधि दें? बस इसलिए कि वह हमारे काम नहीं आ सकता? क्या कल होकर वह पूरी दुनिया के काम आ जाये तो? इस सोच के बाद तो गांधीजी की बात आज के सन्दर्भ में कुछ ज़्यादा ही गलत लग रही है | (गौर कीजिये की मैं अब भी गांधीजी के मूल सन्दर्भ से राज़ी हूँ, मुझे बस उस पंक्ति के आज के परिवेश के सन्दर्भ से परेशानी है |)

6. ठीक है, भाषा हमारी पहचान से जुडी है, हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग है | पर जैसा कि मैंने कहा, अगर यह चली भी जाए, तो इससे इंसानियत को शायद ही कोई दिक्कत हो | सभ्यता में कई चीज़ें आती जाती रहती हैं | यदि हज़ार वर्ष पूर्व की भाषाएँ आज जीवित नहीं बची, तो इससे आज के समाज को कोई हानि है क्या? हाँ, उन भाषाओं का सारा साहित्य बर्बाद हो जाता है, पर फिर यदि सभ्यता की हर चीज़ को ऐसे संभाल कर रखा जाए, कि समाज की प्राकृतिक गति को ठेस पहुंचे, तो शायद यह सही तरीका नहीं | हमारी भाषाएँ अगले हज़ारो वर्षो में कहीं नहीं जाएँगी | फ़िलहाल समाज की प्राकृतिक गति अंग्रेजी और एक वैश्विक एकीकरण की तरफ चल पड़ी है, और इसको रोकना कठिन और अनुचित है | सारा विश्व इस महान भाषा की वजह से आज एक होने की तरफ बढ़ चला है | हाँ, इन सब से देशी भाषाओं के साहित्य का पतन होगा, और कभी प्रेमचंद का नाम बच्चे नहीं जानेंगे, और यह दुर्भाग्यपूर्ण होगा, पर यही तो समाज की गति है | समाज की गति को हम जितना रोके, सभ्यता वर्षो से चली जा रही है और चलती रहेगी | बदलाव आएंगे, चीज़ें जाएँगी, नयी चीज़ें आएँगी | यदि तत्कालीन समाज खुश है, तो सब ठीक है | यदि अपनी संस्कृति की इतनी ही चिंता हो, तो क्यों न हम पाली और प्राकृत भाषाओं को पुनर्जीवित करें ? क्यों हिंदी को भी तवज्जो दें, क्या हिंदी ही हमारी मूल भाषा है ? क्यों न संस्कृत को अधिक महत्त्व दिया जाये? इसलिए न, क्योकि तत्कालीन समाज तत्कालीन हिंदी भाषा से खुश है ? उसी प्रकार कभी पांच सौ साल बाद उस समय का समाज अंग्रेजी से ज़्यादा खुश होगा, तो क्या हम उनसे हिंदी को पुनर्जीवित करने की आशा रखें, यदि हमने खुद अपनी सहूलियत के लिए संस्कृत और पाली को पुनर्जीवित नहीं किया ?

7. मैंने ऐसा नहीं कहा की गांधी जी की बात आधे भारत को बुरी लग जायेगी, मैंने इतना कहा की कुछ सौ साल बाद के परिवेश में यह बात उनको बुरी लगेगी, ध्यान से पढ़ें |

8. यदि लेह से कन्याकुमारी तक सब अंग्रेजी में बात करें, तो यह दुर्भाग्यपूर्ण नहीं है | हाँ, जैसा मैंने पहले कहा, यह दुर्भाग्यपूर्ण तभी है जब यह विशेष रुतबे के लिए किया जाए | ऐसे झूठे रुतबे सामाजिक और सांस्कृतिक उद्दंडता का प्रतीक हैं और इनसे तो दूर ही रहना चाहिए | जब अपनी संस्कृति में शर्म आनी लग जाए, तो इससे बुरा कुछ नहीं; पर जब अपनी संस्कृति को बेहतर और सरल बनाने के लिए दूसरी संस्कृति से मदद ली जाए, तो इससे अच्छी बात भी कुछ नहीं | लेह और कन्याकुमारी के दो नौजवान यदि मिलकर बात करें, तो अंग्रेजी भाषा उनकी संस्कृति को सरल बनाने का काम कर रही है और यह बहुत अच्छी बात है |

आपकी अंग्रेजी में लिखी अंतिम पंक्तियों पर टिप्पणी : यदि हिंदी मातृभाषा वाले आपके पोस्ट को न पढ़ पाएं, तो हो सकता है कि यह उनकी सांस्कृतिक कमी नहीं , यह महज एक हुनर की कमी हो | सीखा मैंने भी बचपन में था आयरन का केमिकल फार्मूला, पर यदि आज मुझे याद नहीं और मुझे रसायनो में रूचि नहीं आई, तो इसका क्या यह मतलब हो कि मैं अपनी शिक्षा का आदर नहीं करता? भाषा भी तो उसी प्रकार है, मेरे आसपास परिवेश कुछ ऐसा बना कि सीखी हुई हिंदी मैं भूलता गया और रूचि नहीं दिखाई, और आज आपके पोस्ट को पढ़ने के काबिल नहीं रहा, इससे मेरे सांस्कृतिक काबिलियत को क्यों परखा जाए?

Rajender has responded in the comments below.

Anurag has responded here.

1 Response
  • Rajender Singh
    Sep 14, 2014

    मित्र तनय,

    आपका जवाब पढ़कर ह्रदय बहुत प्रसन्न हुआ | आपका हर विचार ऐसा दिल को छू रहा है | चंद बातों पर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा |

    1 . अगर आप मेरा ब्लॉग ध्यान से पढ़ेंगे तो पाएंगे कि कहीं भी मैने ब्लॉग में यह नहीं लिखा कि यह पंक्ति गांधी जी ने “नई तालीम” में कही है | बस इतना कहा है कि सन्दर्भ को गहराई से समझने के लिए ‘नई तालीम’ पढ़ें | जितना उसे पढ़ कर मैं समझ पाया हूँ तो गांधी जी ने शायद उन्ही अभिभावकों की बात कही है जिनका उद्देश्य बच्चे को झूठी शान में अपनी संस्कृति की सूली चढ़ाकर अंग्रेजी में निपुण बनाना है या फिर जो बिना उद्देश्य के भी जाने-अनजाने यह कर रहे हैं |
    2 . अंग्रेजी दुनिया को जोड़े | जैसा की मैने कहा हम तो “वसुधैव कुटुम्बकम्” को मानते हैं | हम तो इससे बहुत प्रसन्न होंगे | किन्तु बस इस जोड़- जुड़ाव के चक्र में कहीं हम अपनी धरोहर, अपनी संस्कृति को ही नीच नज़र से देखना न शुरू कर दें , या शायद कुछ भारतवासी शुरू कर भी चुके हैं | जैसा कि आपने भी चिंता जताई है कि ऐसा तो होगा ही तो बस मुझे डर इस बात का है कि अगर हम खुल कर बात नहीं करेंगे तो यह बहुत जल्दी होगा और कहीं हम इसके होने में मदद ना कर दें , या मूक बन कर देखते ना रहें |

    3 . तनय जी जब आप यह कहते हैं कि क्यों ना हम आध्यात्मिक और सामाजिक अंगों से आगे जाकर संपूर्ण जगत की सेवा बारे में सोचें तो मन बहुत प्रफुलित हो उठता है | शायद यह ही बातें हमारे आध्यात्म में भी लिखी हुयी हैं , वसुधैव कुटुम्बकम्” , “सर्वे भवन्तु सुखिनः” आदि | और शायद इन्ही बातों के लिए गांधी जी चाहते थे की हम अपनी आध्यात्मिक और सामाजिक धरोहर से वंचित ना हो जाएँ |
    4 . जब आप कहते हैं कि सभ्यता में कई चीज़ें आती जाती रहती हैं और यह भाषाएँ अगर चली भी जाएँ तो क्या परेशानी है | डर सिर्फ इतना सा है कि जाते – जाते यह ऐसे ना जाएँ कि लोगों को अपनी सभयता – संस्कृति नीच और तुच्छ लगे | लोग बस यही सोच के जीतें रहें की हमारी विरासत में तो कुछ था ही नहीं या कुछ है ही नहीं |.
    5. बंधु, जब आप यह लिखते हैं कि मैने यह पूछ कर कि “आपको पोस्ट पढ़ने में दिक्क्त तो नही हुई?” आपकी सांस्कृतिक काबिलियत को परखा है तो मुझे बहुत दुःख होता है | मैने एक क्षण के लिए भी नही कहा कि हिंदी मातृभाषी पोस्ट ना पढ़ पाएं तो वह सांस्कृतिक नही हैं | मैं तो बस इतना कहा था कि पोस्ट पढ़ने मैं हुई कठिनाई इस बात का प्रतीक है की हम अपनी भाषाओं से कितना दूर आ चुके हैं |

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